अवधेश कुमार कमल हासन ऐसे फिल्म निर्माता या अभिनेता नहीं हैं, जिन पर कभी किसी संप्रदाय के खिलाफ या दुराग्रह भरे समर्थन का आरोप लगा हो। इस समय उनकी
बात मानी जाए तो उनकी
मनोदशा देश छोड़ने तक पर विचार की हो चुकी है। उन्हें समझ ही नहीं आ रहा है कि उनकी फिल्म विश्वरूपम को लेकर विवाद
पैदा हुआ तो क्यों! विश्वरूपम
एक साथ तमिल, तेलुगू और हिंदी में बनाई गई है।
वस्तुत: कमल हासन ने अपनी
फिल्म के बारे में जितनी बातें बताई हैं, उनसे
विवाद का इस प्रकार गहराना
सामान्य तौर पर आश्चर्यजनक माना जाएगा। अगर यह फिल्म अफगानिस्तान पर आधारित है तो इससे भारतीय मुसलमानों के आहत
होने का कोई कारण नहीं होना
चाहिए। बतौर कमल हासन
इसमें इस्लाम मजहब या मुसलमानों के खिलाफ कहीं कुछ भी नहीं है। किंतु आप देख लीजिए, फिल्म के विरुद्ध प्रदर्शन के कारण कई राज्यों में थियेटर मालिक तक इसका प्रदर्शन करने से डर रहे थे और तमिलनाडु
सरकार तो बाजाब्ता इसके
खिलाम मद्रास हाईकोर्ट चली गई। जब हाईकोर्ट की एकल पीठ ने इसे प्रदर्शन के योग्य ठहराने का आदेश दे दिया तो मामला खत्म
हो जाना चाहिए था, लेकिन सरकार ने इसे न्यायालय की दो सदस्यीय पीठ में डाल दिया
और फिर वहां से भी कमल
हासन को राहत नहीं मिली। इसका सीधा अर्थ यही है कि तमिलनाडु सरकार इस फिल्म का प्रदर्शन हर हाल में रोकने पर आमादा है।
ऐसे में कमल हासन या देश में
कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधरों को आघात पहुंचना स्वाभाविक है। इसमें यदि कमल हासन यह कहते हैं कि मुझे न्याय नहीं मिला तो
मैं किसी अन्य प्रदेश में चला
जाऊंगा और आगे देश छोड़ने पर भी विचार कर सकता हूं तो इसे आप गलत नहीं ठहरा सकते। हां, इसे क्षणिक भावावेश में दिया हुआ बयान तो कहा जा सकता है, लेकिन अनुचित
नहीं। हासन ने कहा कि मैं सेक्युलर देश में रहना चाहता हूं। पहली नजर में हमें सेक्युलर शब्द पर आपत्ति हो,
क्योंकि भारत तो घोषित रूप में सेक्युलर देश है और कमल की बात से ऐसा लगता है
मानो भारत में सेक्युलरवाद
है ही नहीं। मजहबी कट्टरता जरा दृश्य देखिए, एक निर्माता अभिनेता ने फिल्म बनाई, जिसे कलाकारों या फिल्म से जुड़े अन्य लोगों के अलावा तमिलनाडु में केवल हाईकोर्ट के न्यायाधीश ने देखी है और उसका इस तरह विरोध
हो रहा है मानो इससे इस्लाम को खतरा पैदा हो गया हो या मुलसमानों की छवि को इतना बड़ा धक्का लगा हो,
जिसकी भरपाई संभव नहीं या उसे सहन करना मानवता के खिलाफ हो। फिर सरकार को देखिए वह आनन-फानन फिल्म को प्रतिबंधित ही नहीं
करती, उसके लिए न्याय का अंतिम दरवाजा भी खटखटाने को तैयार है। यह किसी
सेक्युलर देश का व्यवहार तो नहीं हो सकता। यह तो खांटी मजहबी कट्टरपंथी व्यवहार है, जिसमें सांप्रदायिकता की दुर्गध महसूस करना बिल्कुल आसान है। कमल हासन कहते हैं कि फिल्म को लेकर हो रही राजनीति से आहत हूं। यह केवल एक
व्यक्ति के आहत होने की स्थिति नहीं है। इस आचरण से तो हर उस व्यक्ति को आहत होना चाहिए, जो देश में अभिव्यक्ति की शालीन आजादी को बनाए रखने का पक्षधर है और जो चाहता है कि देश में चाहे वह धर्म का विषय हो, समाज, संस्कृति या
सभ्यता का, उन पर सभ्य तरीके से खुली बहस का माहौल बना रहे। कोई यह कह सकता है कि कमल हासन की घबराहट अभिव्यक्ति की
स्वतंत्रता से ज्यादा अपने वित्तीय
हित को लेकर है। हासन ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, मैंने इस फिल्म के लिए अपनी सारी जायदाद गिरवी रख दी है और रिलीज में देरी के कारण अपना घर भी गंवा चुका हूं। साफ है
कि अगर उनकी फिल्म तमिलनाडु या अन्य कई राज्यों में प्रदर्शित नहीं हुई तो वे वित्तीय कंगाली की अवस्था में पहुंच सकते हैं। यह स्थिति किसी को भी
चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है। मान लीजिए, यदि यही सच हो तो इसमें कमल हासन गलत
कैसे साबित हो जाते हैं?
कला को बाजार, व्यापार
और पूंजी के हवाले किया जाना चाहिए या नहीं, यह विषय निश्चय ही
गंभीर विमर्श की मांग करता है। कला यदि कला के लिए है, इसका उद्देश्य मनोरंजन और लोकशिक्षण है तो फिर यह मुनाफा के लक्ष्य से निवेश की गई बड़ी पूंजी द्वारा संभव नहीं।
पर जब देश में कानून के अनुरूप व्यापार करने और अपनी पूंजी वृद्धि की वैधानिक आजादी है तो हासन ऐसा करके कौन-सा गलत कर रहे हैं? फिर विरोध करने वाले इससे होने वाली संभावित कमाई को तो निशाना बना नहीं रहे हैं। पूरा विरोध
मजहबी सोच पर आधारित है और वह भी केवल अनुमान के आधार पर। कोई भी संतुलित मस्तिष्क इसका समर्थन नहीं कर सकता। कुछ संगठन या व्यक्ति यदि विरोध करें
भी तो उसका सामना किया जा सकता है, लेकिन राजनीतिक नेतृत्व का उनके साथ
खड़ा होना तो विचलित करने वाला है। कोई एक फिल्म पूरे देश की एकता को विखंडित कर सकती है इस तरह का तर्क कैसे किसी के गले उतर सकता है! जब मद्रास
हाईकोर्ट के न्यायाधीश को फिल्म आपत्तिजनक नहीं लगी तो सरकार को क्यों समस्या है? यह तो भारत का दुर्भाग्य है कि कुछ कट्टरपंथी व्यक्ति या संगठन इस तरह सुनी सुनाई बातों पर बावेला मचाते हैं और हमारी कमजोर राजनीति उन्हें
अनुशासित कर न्यायपूर्ण कदम उठाने की जगह उनके सामने झुक जाती है। जाहिर है, राजनीति के इस दुर्बल पाखंडी चरित्र से ऐसे लोगों का मनोबल बढ़ता है और सेक्युलर, उदार सोच के लोग हताश होते हैं। निराधार विरोध कमल हासन पिछले 52 सालों से फिल्मी
दुनिया में हैं। इन्होंने हे राम जैसी चर्चित फिल्म भी बनाई है, जो महात्मा गांधी
की हत्या पर आधारित थी। यह फिल्म किसी को भी गहरे प्रभावित करती है और इसमें गांधी के रूप में भारत
के सेक्युलर चरित्र
को बखूबी दिखाया गया है। कमल हासन की कोई भी फिल्म कभी किसी मजहब के खिलाफ रही ही नहीं तो विश्वरूपम कैसे हो सकती
है। कर्नाटक में भी कुछ
मुस्लिम संगठनों ने इस फिल्म का विरोध किया है। बावजूद इसके वहां पुलिस की सुरक्षा व्यवस्था में फिल्म दिखाई
जा रही है। देखने वालों में हिंदू और मुसलमान दोनों शामिल हैं तथा अपनी प्रतिक्रियाओं में किसी ने भी इसे मजहब के खिलाफ नहीं कहा है। लोगों की
प्रतिक्रियाएं ही यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि इसका विरोध निराधार है और इसके पीछे या तो नासमझी है या फिर कुत्सित सोच। हालांकि कमल हासन को राज्य या देश छोड़ने की
आवश्यकता नहीं होगी, क्योंकि देश का बहुमत उनके साथ है। आम प्रतिक्रिया फिल्म विरोधियों के
विरुद्ध है और यही स्थिति
हमारा मनोबल बढ़ाने वाली है। मकबूल फिदा हुसैन का मामला अलग था। वे बड़े कलाकार थे, लेकिन उनकी तस्वीरों में हिंदू देवी-देवताओं का विकृत चित्रण भी होता था, जिससे सेक्युलर सोच वाले भी सहमत नहीं रहे। बावजूद इसके वे देश छोड़कर गए तो यह उनकी मर्जी थी। यह कहना
गलत है कि सरकार ने उन्हें
सुरक्षा मुहैया नहीं कराई या उनकी जान को इतना खतरा था कि उनके लिए देश छोड़ना ही एकमात्र विकल्प था। कमल हासन या ऐसे
दूसरे लोगों को इस देश में रहकर
ही कट्टरपंथ के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए ताकि ऐसे लोगों का मनोबल कमजोर हो और भारत का सेक्युलर चरित्र एवं अभिव्यक्ति
की मर्यादित स्वतंत्रता
निर्बाध रहे। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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